गौरेला-पेंड्रा-मरवाही-टेंडर के बाद बची राशि से कोटेशन तक… आदिवासी विकास विभाग के निर्माण कार्यों पर गंभीर सवाल,,,मरम्मत, बाउंड्रीवाल और वाल राइटिंग के नाम पर काम कराने का आरोप; दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी की भूमिका पर भी सवाल

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले के आदिवासी विकास विभाग में निर्माण एवं मरम्मत कार्यों को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया के बाद बची राशि अथवा शासन से प्राप्त राशि का उपयोग छोटे-छोटे कार्यों के लिए कोटेशन के माध्यम से किया जा रहा है और कुछ कार्य विभागीय स्तर पर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के माध्यम से कराए जा रहे हैं। यदि ये आरोप सही हैं तो पूरे मामले में प्रक्रिया, तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, माप पुस्तिका, मूल्यांकन और भुगतान व्यवस्था की जांच जरूरी हो जाती है।
पहले ठेकेदार, अब बदला काम कराने का तरीका?

विभागीय कामकाज को लेकर सामने आए दावों के अनुसार पूर्व में कुछ निर्माण एवं मरम्मत कार्य ठेकेदारों के माध्यम से कराए जाते थे, लेकिन अब कार्य कराने के तरीके में बदलाव का आरोप है। दावा किया जा रहा है कि विभागीय स्तर पर ही लोगों की टीम के माध्यम से विभिन्न निर्माण एवं मरम्मत कार्य कराए जा रहे हैं।
ऐसे में सवाल यह है कि इन कार्यों के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई? कार्यादेश किसके नाम जारी हुआ? सामग्री की खरीदी किसके माध्यम से हुई? कार्य की तकनीकी स्वीकृति किस अधिकारी ने दी और भुगतान किसे किया गया?
सहायक आयुक्त बंगले से छात्रावासों तक कार्यों का दावा

आरोपों के अनुसार सहायक आयुक्त के बंगले की बाउंड्रीवाल की ऊंचाई बढ़ाने, गौरेला क्रीड़ा परिसर छात्रावास में दरवाजों की फिटिंग एवं अन्य मरम्मत तथा जिले के विभिन्न आश्रम-छात्रावासों में वॉल राइटिंग जैसे कार्य कराए गए हैं।
मरवाही में छात्रावास की बाउंड्रीवाल से जुड़े कार्यों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं गौरेला क्रीड़ा परिसर में पूर्व में करीब 1 करोड़ 19 लाख रुपये की लागत से कार्य होने की जानकारी सामने आती है। ऐसे में अतिरिक्त मरम्मत अथवा नए कार्यों की आवश्यकता क्या थी, उसका तकनीकी आकलन कितना था और उसके लिए कितनी राशि स्वीकृत की गई—यह रिकॉर्ड से स्पष्ट होना जरूरी है।
दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के माध्यम से निर्माण कार्य?

पूरे मामले में एक कर्मचारी का नाम भी सामने आ रहा है। आरोप है कि दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के माध्यम से निर्माण एवं मरम्मत कार्यों को संचालित कराया जा रहा है।
यहां सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने से अधिक विभागीय प्रक्रिया का है। यदि किसी दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी को निर्माण कार्यों से संबंधित जिम्मेदारी दी गई, तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इसके लिए कौन-सा आदेश जारी हुआ था, उसकी अधिकारिक भूमिका क्या थी और सामग्री एवं भुगतान की प्रक्रिया किस नियम के तहत अपनाई गई।
उक्त दैनिकवेतन भोगी कर्मचारी को लेकर पूर्व में मरवाही विकासखंड के निर्माण कार्यों में अनियमितता के आरोपों के चलते हटाए जाने की बात भी कही जा रही है। हालांकि इस दावे की पुष्टि संबंधित विभागीय आदेश एवं आधिकारिक रिकॉर्ड से होना बाकी है।
उपअभियंता की भूमिका भी जांच के दायरे में
मामले की एक अन्य कड़ी विभागीय उपअभियंता अंकित जैन की भूमिका को लेकर सामने आ रही है। उनके संबंध में मरवाही क्षेत्र में आदिवासी सरपंचों एवं जनप्रतिनिधियों के साथ कथित अभद्र व्यवहार तथा कमीशन से जुड़े आरोप लगाए जाने की बात कही जा रही है।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यदि संबंधित अधिकारी की भूमिका तकनीकी परीक्षण, माप पुस्तिका, मूल्यांकन अथवा भुगतान प्रक्रिया में रही है, तो संबंधित अभिलेखों की जांच से वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
ट्राइबल विभाग के तकनीकी अधिकारी की जगह आरईएस एसडीओ से मूल्यांकन क्यों?
मामले का सबसे अहम सवाल तकनीकी मूल्यांकन और सत्यापन को लेकर है। आरोप है कि ट्राइबल विभाग के अनुविभागीय अधिकारी के स्थान पर ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) के एसडीओ को कुछ कार्यों के मूल्यांकन अथवा सत्यापन की जिम्मेदारी देने का आदेश जारी किया गया। यदि ऐसा आदेश जारी हुआ है तो इसकी आवश्यकता और वैधानिक आधार क्या था? क्या संबंधित विभाग में तकनीकी अधिकारी उपलब्ध नहीं थे? आरईएस के एसडीओ को यह जिम्मेदारी किस आदेश या नियम के तहत दी गई? आदेश की प्रति और संबंधित फाइल सामने आने पर ही इन सवालों का स्पष्ट जवाब मिल सकता है।
फाइल में प्रक्रिया पूरी, जमीन पर कितना काम?
पूरे मामले की वास्तविकता जानने के लिए कागजी रिकॉर्ड के साथ मौके का भौतिक सत्यापन भी जरूरी है। जांच में यह देखा जाना चाहिए कि जिन कार्यों के लिए राशि खर्च की गई, वे वास्तव में मौके पर हुए या नहीं और यदि हुए तो स्वीकृत प्राक्कलन के अनुरूप हुए या नहीं।
सवाल कई हैं—यदि कोटेशन लिए गए तो कितने कोटेशन प्राप्त हुए? किस व्यक्ति या फर्म को काम दिया गया? कार्यादेश कब जारी हुआ? तकनीकी स्वीकृति किसने दी? माप पुस्तिका किसने तैयार की? सामग्री कहां से खरीदी गई? भुगतान किसे किया गया? कार्य का भौतिक सत्यापन किस अधिकारी ने किया? और क्या भुगतान से पहले सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की गईं?
करीब 80 छात्रावासों में वॉल राइटिंग का खर्च भी जांच के दायरे में
जिले के अनेक आश्रम एवं छात्रावासों में वॉल राइटिंग और बोर्ड पेंटिंग जैसे कार्य कराए जाने की जानकारी भी सामने आ रही है। यदि जिले के लगभग 70–80 छात्रावासों में ऐसे कार्य कराए गए हैं तो प्रत्येक संस्था पर खर्च की गई राशि, कुल व्यय, कार्य कराने की प्रक्रिया और भुगतान का स्रोत भी सार्वजनिक जांच का विषय बन सकता है। छोटे-छोटे कार्यों को अलग-अलग दिखाकर क्या प्रक्रिया अपनाई गई, अथवा सभी कार्यों के लिए कोई समेकित स्वीकृति और निविदा व्यवस्था थी—यह जानकारी संबंधित फाइलों से ही स्पष्ट होगी।
जिला प्रशासन की निगरानी पर भी सवाल
आदिवासी विकास विभाग सीधे आश्रमों, छात्रावासों और विद्यार्थियों से जुड़ा महत्वपूर्ण विभाग है। ऐसे में निर्माण एवं मरम्मत कार्यों को लेकर शिकायतें सामने आती हैं तो उनकी निष्पक्ष तकनीकी एवं वित्तीय जांच आवश्यक है। मांग उठ रही है कि संबंधित सभी कार्यों की स्वीकृति, प्राक्कलन, तकनीकी स्वीकृति, कोटेशन, कार्यादेश, माप पुस्तिका, मूल्यांकन रिपोर्ट, भुगतान वाउचर, सामग्री खरीदी के बिल और संबंधित अधिकारियों के आदेश की जांच कराई जाए। साथ ही मौके पर स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया जाए, ताकि कागज और जमीन पर हुए कार्यों के बीच कोई अंतर है या नहीं, यह स्पष्ट हो सके।
सवाल सीधा है—रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए सामने आए
यदि सभी कार्य नियमों के अनुरूप हुए हैं तो संबंधित रिकॉर्ड की जांच से स्थिति स्वतः स्पष्ट हो सकती है। और यदि प्रक्रिया में कोई विचलन हुआ है तो दस्तावेजों की जांच से उसकी जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। अब सवाल केवल किसी एक कार्य या किसी एक कर्मचारी का नहीं है। सवाल यह है कि शासन की राशि से होने वाले निर्माण एवं मरम्मत कार्यों की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और क्या हर स्तर पर नियमों का पालन किया गया है?
इन सवालों का जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड, तकनीकी जांच और मौके के भौतिक सत्यापन से सामने आना चाहिए।









